राजनीति का दोहरा चरित्र
आज कल मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में
शराबमुक्ति, शराबबंदी
जैसे शब्दों के साथ तरह तरह के स्लोगन, कार्टून और व्यंग
देखने को मिल रहे है| बहुत अच्छा सन्देश रहता है, और ऐसा महसूस होता है की चलो ‘देर आये, दुरुस्त आये’ | परन्तु यह ध्यान देने योग्य बात है
कि शराब के सहारे ही चुनाव जीतने वाली राजनीतिक पार्टियाँ अब किस मुंह से शराबबंदी
की बात करेगी। भ्रष्टाचार के बाद शायद अगला राजनीतिक मुद्दा,शराब
ही है। बिहार के मुख्यमंत्री के साहसिक निर्णय ने कई नेताओं को सोचने के लिए मजबूर
कर दिया है। शराबबंदी इस तरह राजनीति का एक बड़ा मुद्दा बन जाएगी किसने सोचा था।
लेकिन सवाल यह उठता है कि शराब से मिलने वाला राजस्व, जहां
राज्य का एक बड़ा सहारा है, वहीं शराब माफियाओं से
मिलने वाला पार्टी फण्ड राजनीति की विसात बिछाने के लिए उपयोग होता है | तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता भी अपनी सरकार की वापसी पर शराबबंदी का
वायदा कर रही हैं। भविष्य में देश के अन्य राज्यों की राजनीति एक-दो चुनाव तक
शराबबंदी के इर्द गिर्द ही घुमने की सम्भावना है |
भारतीय समाज में शराब की वजह से कई तरह की समस्याएं हैं। खासकर
गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों में तो शराब की वजह से जीवन ही ख़राब हो रहा
हैं। अपने खून-पसीने की कमाई शराब में बहाकर तमाम परिवारों के पुरूष, महिलाओं पर अत्याचार करते
हैं। कितना दोहरा चरित्र है हमारी सरकारों का कि एक तरफ शराब बेच रहे है, नए नए शराब के ठेके दे रहे है, तो वहीं दूसरी तरफ
शराब के विरूद्ध जन-जागरण भी कर रहे हैं। एक तरफ आबकारी विभाग भी चलाता हैं तो
दूसरी ओर मद्यनिषेध विभाग भी चलाता हैं। क्या यह एक ढोंग नहीं है ? इससे तो यही पता चलता है कि हम कितने ढोंगी और दोहरे चरित्र वाले समाज में
जी रहे हैं। शराब का बिकना और मिलना इतना आसान हो गया है कि वह पानी से ज्यादा
सस्ती हो गयी है। कितनी घोर विडंबना है कि देश के कई इलाकों में पानी लाने के लिए
लोग मीलों चलते है, किंतु शराब तो शहर के हर मोहल्ले और गाँव
के चौपालों तक आसानी से मिल जा रही है |
क्या शराब जीवन के लिए इतना जरुरी है ? या राजनितिक माफिया इस समाज को
अपने चक्रव्यूह में फंसा के समाज को बाँट के रखना चाहते है ? समाज के हर तबको खासकर युवा वर्ग को एक बार सोचने की जरूरत है | बिहार जैसे पिछड़े राज्य ने यह हिम्मत जुटाई है, गुजरात ने यह कार्य पहले ही कर लिया है परन्तु अभी भी कई राज्य इस बात से
हिचक रहे हैं | शायद या फिर निश्चित रूप
से शराब माफिया की जकड़ और पकड़ हमारे तंत्र पर इतनी मजबूत है कि हम ‘शराब मुक्त राजनीति’ और
‘शराब मुक्त समाज’ की कल्पना नहीं कर सकते है |
बढ़ते अपराधों, बिखरते परिवारों, महिलाओं
का उत्पीड़न, परिवार की बिगड़ती आर्थिक दशा की जड़ सिर्फ
और सिर्फ शराब ही है , चाहे वो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से
ही प्रभाव क्यों न डालती हो । कठोर राजनीतिक संकल्पों से ही समाज को शराबमुक्त
बनाया जा सकता है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने ऐसे ही संकल्प करने की
हिम्मत दिखाई है । बस उनको इस संकल्प को दृढ़ता के साथ कार्यशैली में तब्दील करना
है जिसका असर जमीनी स्तर तक महसूस किया जा सके|
भारत जैसे युवा देश की नई पीढ़ी को नशे से मुक्त
कराना हम सबकी और राजनैतिक जिम्मेदारी है। शराब के खिलाफ नहीं, हर नशे के खिलाफ जागरूकता
ही इसका विकल्प है। आज भारत डिजिटल युग में है और हम सबका कर्तव्य बनता है की
जनजागरण के तहत सोशल मीडिया का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें , पब्लिक रिलेशन बनाएं, जागरूकता फैलाएं जिससे सुन्दर
और स्वस्थ्य समाज की स्थापना की जा सके | इसी तरह समाज को एक दिशा दिया जा सकता है |
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